Verse 231-मानव- Human

मानव क्या है ? बस मानव है – बोल गए पितर ,
समझ सका न कथन यह उनका मैं तो रत्ती-भर।
सोचूं, बहुत चतुर थे उनकी बुनती समझ ना आई ,
उस बुनती के और अधिक उलझा बैठा वह ‘घर’ ||

Verse 193-सिनेमाघर -Theatre

इन्सां बड़ा खिलाड़ी बनता खेल-खेल मगर ,
वाह-वाही की खातिर हर पल बनता है एक्टर।
थपकी अच्छी होती केवल वही जो हो स्वाभाविक ,
वारना उसका घर बन जाता बिलकुल सिनेमाघर ||

Verse 170-इंसान -Humans

मानव अक्खड़ होते हुए भी होता बहुत चतुर,
पड़े ज़रूरत तो कर लेता हृदय को पत्थर।
इसकी जिजीविषा की महिमा है वेदों में वर्णित,
वक्त पड़े तो त्याग दे बिन-झिजके यह अपना घर ||

Verse 75- ग़रूर – Ego

मानुष इक दिन करने लगा था अल्लाह से अकड़,
कहे मैं सब से सार को जानूं, मैं ज्ञानी चातुर |
अल्लाह पूछे क्या है तेरा बोलो मुझसे रिश्ता,
तब मानुष सर नीचे कर के आया वापिस घर ||