Verse 20-ऊषा – Dawn

यह प्रभात की बेला लौ के अधखुले है दर ,
आद्य कुंवारी को घूँघट खुलने का रहता डर |
देखे मुझे जाने क्या बोली मारे मेरा कन्त,
इसी लिए शर्माती आती हु अपने घर

Verse 125 – रौशनी – Light

ईश्वर ने है दिए रात को अनगिन नयन हज़ार,
जब डूबे है सूरज दुनिया सो जाती अक्सर।
लौ की प्यासी दुनिया को न मिलते प्रेम-सपन,
लालटेन पाकर अँधियारा, जगमग करे है घर।|