Verse 176-मुखौटा-Mask

बाहर हँसती भीतर-भीतर चुभते हैं खंजर,
पुच-पुच करती चुम्मा देकर ख़ुश करती है पर।
जीवन के संघर्ष और तिस पर घुन-खाया उद्यम,
बात समझ न आए तो फिर ढहता जीवन-घर ||