Verse 230-खेल – Game

सभी पैंतरे ठीक पड़े जब होता है बेहतर,
हद पहचाने इन्सां, खेले सीमा के भीतर।
इस से पहले किस्मत उसकी बदले अपनी चाल ,
यारों की टोली से बोले – मैं चलता हूँ घर ||