Verse 143-प्रेम -Love

उलट-उलट कर खत्म न होती प्रेम-भरी गागर,
स्वयं देख ले इसे उलट कर, इसको खाली कर |
इसके जैसी अंतहीन हो चाहे इसकी प्यास,
चिंता न कर, कर दे खली, अतल हमारा घर ||  

Verse 129-प्रणय-Love

जब मम्मी मंदिर जाती है और डैडी दफ्तर,
मैं खिड़की से करूँ इशारा वो आता अंदर |
पूछ मुझे मत क्या करते हम होता क्या है हाल,
प्रेम-प्यार में तब बनता है घर के अंदर घर ||

Verse 127 – स्नेह – Affection

सारी खुशियाँ,सोच, वासना प्रीत के हैं चाकर,
इसके मेह्तर-वैद, संतरी सब इसके नौकर |
कोई अगर लालसा जिगर जलाये वह भी इसकी दास,
प्रीत है मलिका, चले हुकूमत इसकी है घर-घर ||