Verse 148- कविता -Poem

धागा टूट रहा है, सीवान आती न सुन्दर,
टेढ़ी-मेढ़ी कलम है मेरी  खींच रही है लकीर |
सीधा कर दे धागा, मेरी है अरदास कलम,
रह ना जाए कहीं अधूरी मेरी कविता घर ||