Verse 114-महबूब- Lover

तू मस्तानी, है मन-भानी रूप का तू सागर,
ओक लगा के मांग रहा हूँ उंढेल दे तू गागर |
मुझे रूप की तृषा, प्रेम-जल का हूँ मैं तो प्यासा,
छलक रहा है रूप-तरंगित तेरा प्रेमिल घर ||