Verse 92-मुक्त – Free

भृकुटी माथे डाल के यारा, चित दुखी न कर,
द्वेषी, और रंजिश भारी पड़ते सदा ही प्रीती पर |
कड़वे बोल न बोल तू चाहे तोड़ दिलों के रिश्ते,
छोड़ यह रंजिश आओ चलें हम अपने-अपने घर ||

Verse 75- ग़रूर – Ego

मानुष इक दिन करने लगा था अल्लाह से अकड़,
कहे मैं सब से सार को जानूं, मैं ज्ञानी चातुर |
अल्लाह पूछे क्या है तेरा बोलो मुझसे रिश्ता,
तब मानुष सर नीचे कर के आया वापिस घर ||