Verse 97-क्षितिज- Horizon

मानव जैसे-जैसे चलता साथ चले अम्बर
क्षितिज की दूरी चलते-चलते मिटती नहीं मगर |
द्रिष्टी और पृथ्वी के सम पर क्षितिज बना ही रहता,
इस तरह जो चले उम्र भर कभी न पहुँचे घर ||

Verse 96-पृथ्वी – earth

पृथ्वी की गोलाई से ही क्षितिज बने हैं, मगर,
हद इसकी एक और भी होती, मानुष की नज़र |
पृथ्वी की गोलाई को तो बदल नहीं हम सकते ,
सीमा क्षितिज की बदल सकेंगे बनवा ऊंचा घर ||

Verse 72-पतंग – Kite

जीवन एक पतंग की नांईं, छूती है अम्बर,
परवाह नहीं जो मांझा देता चीरें हातों पर।
कस के रख तू बिना ढील के, मांझा बहुत है तेज़,
यदि लड़ाने पेंच चढ़ा कर लाने वापिस घर ||