Verse 232-अन्त: मन- Soul

रूप नहीं मरता है हरगिज़ रहता है सदा अमर ,
चोला एक त्याग के पहने दूजे यह ‘बस्तर’ |
माँ मृत्यु के बाद भी बेटी-रूप में जीवित रहती,
रूप बदलता रहता ऐसे रहने हेतु घर ||

Verse 188- पथ-Path

तर्क और तकरार का मन में भरा रेत-सागर,
इस पर चलने से होता है मर जाना बेहतर।
अगणित पड़ जाते हैं ऐसे रूह के ऊपर ,
डगर छोड़ कर रुकना पड़ता किसी-किसी के घर ||

Verse 162- Bistar- Bed

नर्म मुलायम मख़मल जैसे मिले मुझे बिस्तर,
क्यों विकल मन चैन ना पाए, नींद न आए पर |
भला रूह की आँख से ओझल रहते कौन-से रंज,
कैसे भाग्य प्रतीक्षा करते बैठे मेरे घर ||

Verse 110- परमेश्वर-god

मुहम्मद,मरियम, महावीर और सिखों के सतगुर
ईसा,बुद्ध, लाओत्से, मोजिज रूहों के डॉक्टर |
पीड़ा छलनी करे कलेजा कोई दवा नहीं देता ,
कई लुकमान बने बैठे है अपने-अपने घर ||