Verse 159-घर-Home

महल भी घर है, कुटिया घर है,  मग और  जंगल घर ,
कारागार को, मंदिर को भी  मान जो  लेता घर |
घर श्रद्धा है , मात्र नहीं यह दीवारों का वृत्त ,
जिस वास्तु में दिल रखोगे, दिल में करे वो घर ||

Verse – 24 – आशा – Aasha

प्रीत का मै देवालय बना कर आया था भीतर ,
आशाओं का डीप जला तू प्रीत बना मंदिर|
पर एक देवी प्रीत की मलिका बोली कर्कश बोल,
न ये मंदिर तेरी खातिर न हे तेरा घर ||

Verse 23- मंदिर – Devalya

एक दिन मई दुखियारा पहुंचा शिवजी के मंदिर ,
मगन खड़ा था शिव-अर्चन में साधु एक्कड़ |
मई बोलै विपता का मारा सीख दीजिये कुछ ,
बोलै वह, क्यों आये यहाँ पर तेरा मंदिर घर ||

Verse 88-बिकाऊ-Dishonest

यहाँ बिकाऊ हर वस्तु है गिरजे और मंदिर,
बेचने आया मैं भी अपना रोटी खातिर घर |
पर यह मेरी पत न माने करती मिन्नतें-शिकवे,
रोटी और कपड़े की खातिर भाई बेच न घर ||

Verse 27 – अल्लाह का घर – God’s House

मंदिर मस्जिद और गिरजों में उमड़े जन के लष्कर,
पाप कमाई बख्षाने को आते हैं अक्सर।
वहम उन्हें है धोखे से ‘वो’ बन जाएगा मूर्ख,
सब का लेखा यहाँ पे रहता यह अल्लाह का घर।।

Verse 1 – भेंट – Gift

ले यह भेंट और दे चरणामृत दाता मेरे ठाकुर,
मैं चढ़ावा लेकर आया अपनी कविता ‘घर’ |
ना मैं लाया भेंट रूपया ना ही मांगू दौलत,
मेरी भेंट यह लेकर बाँट आना घर-घर ||