River Sage-2-Build My Castles In The Air

Once I tried to walk my dreams,
And put my mind to only flesh and bone.
And overt physicality of schemes,
But after a few steps, I fell down.
All my muscles, sinews, nerves and will
Were powerless to put me on my feet,
I tried and tried and tried and tried but still
I found myself squarely on my seat.
All my efforts, having all my sweat,
Which I had pre-invested were futile,
But I had learnt that frustration and fret
Are never helpful even for a while.
Hence I started dreaming then and there
And bent to build my castles in the air.

Verse 203-ताला-Lock

व्यक्त मई जो भी करना चाहूँ संधे नहीं अक्षर,
सोच तो दिव्या है मेरी किन्तु अक्षर है अक्खड़ |
माँ बोली की सीमाओं ने कंठ किया अवरुद्ध ,
भीतर कैसे जॉन यह है तालाबंद इक घर |

Verse 199-चूहा -Rat

मेरी सोच में छाया जाने कैसा यह फितूर,
जैसे मूषक रात भर करते कुतर -कुतर |
किस वस्तु की मुझे लालसा किसकी खोज करूँ ,
चिंताओं के चूहों ने तो किया खोखला घर ||

Verse 144-चिंता -Worry

नसों में मेरी अजब अनोखी भर देती तिर-मिर,
बिजली है यह सोच की मानो तिल जितना कंकर |
शांत झील में गिरे तो लहरें पैदा करें अनेक,
चिंताओं से काँप रहा है थर-थर मेरा घर ||

Verse 82- विचार- thoughts

जितने मन हैं उतनी सोचें उतने ही अंतर,
अपने-अपने नाप से सब के बनते हैं वस्र |
भेद सोच का है यह सारा, अपनी-अपनी खोज,
जिसको जैसा भाया, वैसा लिया बनाए घर ||

Verse 81- बच्चे – Children

बच्चों के हम जनक हैं, वे ना हमारे मगर,
समतल उनकी सोच के गर तुम रहने दो क्षेत्र |
कोई बनेगा इनमें गौतम होगा कोई मसीह,
सोच हमारी भिन्न है चाहे साँझा अपना घर ||

Verse 127 – स्नेह – Affection

सारी खुशियाँ,सोच, वासना प्रीत के हैं चाकर,
इसके मेह्तर-वैद, संतरी सब इसके नौकर |
कोई अगर लालसा जिगर जलाये वह भी इसकी दास,
प्रीत है मलिका, चले हुकूमत इसकी है घर-घर ||